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मंगलवार, 22 जुलाई 2008
kavita
हे खंड रहित मंडलाकार , हे जग प्रपंच भासकागार , हे द्वैत जगत के एक सार , दो भावभक्ति का हमें दान
दीनदयाल मणि त्रिपाठी
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